Friday, January 27, 2012
Wednesday, June 30, 2010
Sunday, June 27, 2010
Monday, May 31, 2010
Tuesday, April 13, 2010
Saturday, April 3, 2010
Thursday, March 25, 2010
Wednesday, March 24, 2010
Tuesday, March 23, 2010
Monday, February 1, 2010
Tuesday, November 10, 2009
ग़ज़ल
मक़बरों सा है सुकूत, ऐ दिल घरों के दरमियाँ
चल कहीं इक घर बना लें मक़बरों के दरमियाँ
काफ़िरों के संग तो कट जाएगी मेरे ख़ुदा
ज़िन्दगी दुशवार है पर कायरों के दरमियाँ
बुद्ध की प्रतिमाएं तुमने तोड़ दीं अच्छा किया
बुद्ध की रूह घुट रही थी पत्थरों के दरमियाँ
आप भगवा डाल कर मठ में रहो आराम से
काम क्या है जंगजूओं सरफिरों के दरमियाँ
मुंह से निकला आपकी मर्ज़ी से साँसे चल रहीं
और तो हम क्या बताते मुखबिरों के दरमियाँ
('मैं और बोगनवीलिया' से)
चल कहीं इक घर बना लें मक़बरों के दरमियाँ
काफ़िरों के संग तो कट जाएगी मेरे ख़ुदा
ज़िन्दगी दुशवार है पर कायरों के दरमियाँ
बुद्ध की प्रतिमाएं तुमने तोड़ दीं अच्छा किया
बुद्ध की रूह घुट रही थी पत्थरों के दरमियाँ
आप भगवा डाल कर मठ में रहो आराम से
काम क्या है जंगजूओं सरफिरों के दरमियाँ
मुंह से निकला आपकी मर्ज़ी से साँसे चल रहीं
और तो हम क्या बताते मुखबिरों के दरमियाँ
('मैं और बोगनवीलिया' से)
Monday, November 9, 2009
ग़ज़ल
मज़हबी अफ़साद में फिर से कटी भारी फ़सल
बच गये हम गिर गया है कोख से लेकिन हमल
देखिये तो देखिये इस दौर की बस इर्तिक़ा
जाने दीजे दिल अगर रह-रह के जाता है दहल
ज़हन-ए-मामूली में मेरे बात ये आती नहीं
दौर-ए-हाज़िर में अगर है क्या है अल्लाह का फ़ज़ल
दिल अगर हो आह-ए-मज़लूमां से जाता है झुलस
खौलते शोरे से भी पत्थर नहीं जाता पिघल
फ़र्क़ करती ही नहीं कुछ रहमत-ए-सुख़न और फ़न
मुफ़लिस-ए-बेदाग़ हो या हो शहंशाह-ए-मुग़ल
**** ****
चाँद होता है मुक़म्मल देखता पाके तुझे
झील में खिलते हैं तुझको देखता पाके कँवल
तुम हो मंगल की तरह जिसके हैं दो दो चन्द्रमाँ
एक तो मैं हूँ मेरी जां एक है मेरी ग़ज़ल
(प्रकाशित: 'कान्ति' मासिक)
बच गये हम गिर गया है कोख से लेकिन हमल
देखिये तो देखिये इस दौर की बस इर्तिक़ा
जाने दीजे दिल अगर रह-रह के जाता है दहल
ज़हन-ए-मामूली में मेरे बात ये आती नहीं
दौर-ए-हाज़िर में अगर है क्या है अल्लाह का फ़ज़ल
दिल अगर हो आह-ए-मज़लूमां से जाता है झुलस
खौलते शोरे से भी पत्थर नहीं जाता पिघल
फ़र्क़ करती ही नहीं कुछ रहमत-ए-सुख़न और फ़न
मुफ़लिस-ए-बेदाग़ हो या हो शहंशाह-ए-मुग़ल
**** ****
चाँद होता है मुक़म्मल देखता पाके तुझे
झील में खिलते हैं तुझको देखता पाके कँवल
तुम हो मंगल की तरह जिसके हैं दो दो चन्द्रमाँ
एक तो मैं हूँ मेरी जां एक है मेरी ग़ज़ल
(प्रकाशित: 'कान्ति' मासिक)
ग़ज़ल
उठी जो शायरी अगर समझ ले लक्ष्मीबाई है
क़लम नहीं है हाथ में मिरे दियासलाई है
जो चुन रहे हो रहनुमाई छल करेगी सोच लो
ये मेरी आप-बीती है ये ख़ुद की आज़माई है
ये लोग बेच-बाँट कर धरोहरों को खा गये
बची-खुची महानता हमारे हिस्से आई है
जहां कहीं भी ज़िन्दगी ने मुझको आज़माया है
तो मेरे साथ में खड़ी मिरी शिकस्तापाई है
जो दिल धड़क गया कहीं तो दर्द फन उठाएगा
ये याद जाग जाये न अभी-अभी सुलाई है
-('मैं और बोगनवीलिया' से)
क़लम नहीं है हाथ में मिरे दियासलाई है
जो चुन रहे हो रहनुमाई छल करेगी सोच लो
ये मेरी आप-बीती है ये ख़ुद की आज़माई है
ये लोग बेच-बाँट कर धरोहरों को खा गये
बची-खुची महानता हमारे हिस्से आई है
जहां कहीं भी ज़िन्दगी ने मुझको आज़माया है
तो मेरे साथ में खड़ी मिरी शिकस्तापाई है
जो दिल धड़क गया कहीं तो दर्द फन उठाएगा
ये याद जाग जाये न अभी-अभी सुलाई है
-('मैं और बोगनवीलिया' से)
Friday, September 4, 2009
ग़ज़ल
मैं मुक़द्दर से मुनकिर न था जब गया
लौट कर आ गया नौकरी लग गया
ज़िन्दगी के सवालों के हल ढूंढता
जागता हूँ अभी एक फिर बज गया
ये हक़ीक़त डराती है हर रात को
मैं भी इतिहास के ढेर में दब गया
एक अच्छे दिनों का भी था काफ़िला
ना भनक तक लगी किस तरफ़ कब गया
रोज़ जब डूबता है समंदर में दिन
दिल भी लगता है बस अब गया अब गया
-सतीश बेदाग़
('मैं और बोगनवीलिया' में से)
लौट कर आ गया नौकरी लग गया
ज़िन्दगी के सवालों के हल ढूंढता
जागता हूँ अभी एक फिर बज गया
ये हक़ीक़त डराती है हर रात को
मैं भी इतिहास के ढेर में दब गया
एक अच्छे दिनों का भी था काफ़िला
ना भनक तक लगी किस तरफ़ कब गया
रोज़ जब डूबता है समंदर में दिन
दिल भी लगता है बस अब गया अब गया
-सतीश बेदाग़
('मैं और बोगनवीलिया' में से)
Friday, August 14, 2009
JASHN-E-AZAADI PAR
Kaisi azaadiaan manayein ham
Kaise ghee ke diye jalaein ham
Jazba-e-jaan-faroshi kho baithe
Wo ganwa aaye bhaavnaein ham
Teri qurbaaniaan ganwa baithe
Ham Bhagat Singh talak bhula baithe
Ham siyaasat ke haath bik gaye maa
Tujh ko kis munh ser ye bataayein ham
Apne khatir hi daud-bhaag rahi
Ab kahaan seeno mein wo aag rahi
Aankh nam hoti hai magar ab bhi
Jab taraane wo gungunaaein ham
Ham hain bahu-rashtriya nishaano pe
Fir ghulaami ke hain muhaano pe
Ab to uthna padega ae yaaro
Kaise munh dhaamp ke so jaaein ham
Doodh ki laaj kyun na rakhne chalein,
Aaj fir se vasanti pehne chalein,
Chandrashekhar Subhash banne chalein,
Kyun na fir khud ko aazmaaein ham !
-SATISH BEDAAG
Kaise ghee ke diye jalaein ham
Jazba-e-jaan-faroshi kho baithe
Wo ganwa aaye bhaavnaein ham
Teri qurbaaniaan ganwa baithe
Ham Bhagat Singh talak bhula baithe
Ham siyaasat ke haath bik gaye maa
Tujh ko kis munh ser ye bataayein ham
Apne khatir hi daud-bhaag rahi
Ab kahaan seeno mein wo aag rahi
Aankh nam hoti hai magar ab bhi
Jab taraane wo gungunaaein ham
Ham hain bahu-rashtriya nishaano pe
Fir ghulaami ke hain muhaano pe
Ab to uthna padega ae yaaro
Kaise munh dhaamp ke so jaaein ham
Doodh ki laaj kyun na rakhne chalein,
Aaj fir se vasanti pehne chalein,
Chandrashekhar Subhash banne chalein,
Kyun na fir khud ko aazmaaein ham !
-SATISH BEDAAG
Saturday, July 18, 2009
ग़ज़ल
एक मासूम मुहब्बत पे मचा है घमसान
दूर तक देख समन्दर में उठा है तूफ़ान
एक लड़की थी सिखाती थी जो खिल कर हंसना
आज याद आई तो हो आई है सीली मुस्कान
एक वो मेला वो झूला वो मेरे संग तस्वीर
क्या पता खुश भी कहीं है के नहीं वो नादान
फिर से बचपन हो तेरा शहर हो और छुट्टियां हों
काश मैं फिर रहूँ कुछ रोज़ तेरे घर मेहमान
एक मुंडेर पे इक गाँव में इक नाम लिखा है
रोज़ उस में से ही खुलता है ये नीला असमान
('मैं और बोगनवीलिया' में से)
दूर तक देख समन्दर में उठा है तूफ़ान
एक लड़की थी सिखाती थी जो खिल कर हंसना
आज याद आई तो हो आई है सीली मुस्कान
एक वो मेला वो झूला वो मेरे संग तस्वीर
क्या पता खुश भी कहीं है के नहीं वो नादान
फिर से बचपन हो तेरा शहर हो और छुट्टियां हों
काश मैं फिर रहूँ कुछ रोज़ तेरे घर मेहमान
एक मुंडेर पे इक गाँव में इक नाम लिखा है
रोज़ उस में से ही खुलता है ये नीला असमान
('मैं और बोगनवीलिया' में से)
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